Tuesday, 18 December 2012

मेरे फर्क को तू अपनी ज़ुबानी

मेरे फर्क को तू अपनी ज़ुबानी में ,
बदलाव कह ले ऐ ज़माने ।
जो भी हो सूरज को जाते ,
चाँद को आते देर नहीं लगती ।
----------------------------------------- डॉ. प्रतिभा द्विवेदी 'स्वाति ' 

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